Politics
केंद्र सरकार ने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) पर प्रतिबंध को अगले 5 वर्षों के लिए बढ़ा दिया है।
गृह मंत्रालय ने कहा कि ULFA, अपने सभी गुटों और अग्रणी संगठनों के साथ मिलकर ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हानिकारक हैं।
असम को भारत से अलग करने के उद्देश्य से जारी गतिविधियों के कारण केंद्र सरकार ने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) पर प्रतिबंध को अगले 5 वर्षों के लिए बढ़ा दिया है। इस आशय की अधिसूचना गृह मंत्रालय द्वारा 25 नवंबर, 2024 को जारी की गई।
ULFA को पहली बार 1990 में प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था, क्योंकि यह भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त था। 1 जुलाई, 2024 की अवधि के दौरान, असम में विस्फोटों या विस्फोटक लगाने से संबंधित 16 आपराधिक मामलों में इसकी संलिप्तता पाई गई। इस संगठन पर पहले भी समय-समय पर प्रतिबंध लगाया जाता रहा है। स्वतंत्रता दिवस, 2024 से पहले पूरे असम में इस संगठन द्वारा कई तात्कालिक विस्फोटक उपकरण (IED) लगाए जाने की घटनाएँ सामने आई थीं।
गृह मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत पिछली बार ULFA पर प्रतिबंध 27 नवंबर, 2019 से 5 वर्षों के लिए बढ़ाया गया था। 25 नवंबर, 2024 को जारी नवीनतम अधिसूचना के अनुसार, केंद्र सरकार ने इस संगठन के सभी गुटों, शाखाओं और सहयोगी संगठनों को 27 नवंबर, 2024 से अगले 5 वर्षों के लिए गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया है।
गृह मंत्रालय ने कहा कि ULFA, अपने सभी गुटों और अग्रणी संगठनों के साथ मिलकर ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हानिकारक हैं। संगठन ने असम को भारत से अलग करने के अपने उद्देश्य की सार्वजनिक रूप से घोषणा की है और अवैध धन उगाही तथा जबरन वसूली जैसी गतिविधियाँ जारी रखी हैं। इसके अलावा, यह अन्य उग्रवादी समूहों के साथ भी संबंध बनाए रखता है।
अधिसूचना में यह भी उल्लेख किया गया है कि संगठन के पास अवैध हथियार और गोला-बारूद हैं, और यह 27 नवंबर, 2019 से विध्वंसक गतिविधियों में शामिल रहा है। माना जाता है कि ULFA के कट्टरपंथी गुट का नेतृत्व परेश बरुआ कर रहा है, जो चीन-म्यांमार सीमा पर अपने सुरक्षित ठिकानों से संगठन की गतिविधियों को संचालित कर रहा है।
गौरतलब है कि ULFA के वार्ता समर्थक गुट, जिसका नेतृत्व अरबिंद राजखोवा कर रहे हैं, ने 29 दिसंबर, 2023 को केंद्र और असम सरकार के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत संगठन ने हिंसा छोड़ने, हथियार सौंपने, संगठन को भंग करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की थी। हालांकि, परेश बरुआ के नेतृत्व वाला कट्टरपंथी गुट अब भी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त बना हुआ है।
सरकार का यह कदम असम में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
ULFA, Assam Militancy, Insurgency in Northeast India, United Liberation Front of Asom, Assam Conflict, Separatist Movement, North East India Terrorism, Armed Struggle, Peace Talks, Indian Security Forces
#ULFA, #AssamConflict, #InsurgencyIndia, #NortheastIndia, #SeparatistMovement, #Militancy, #TerrorismInIndia, #AssamHistory, #ULFARebels, #AssamStruggle, #FreedomMovement, #IndianSecurityForces, #PeaceTalks, #ULFATerrorism, #NorthEastPolitics, #ULFAMilitants, #AssamTerrorism, #BannedOrganizations, #AssamViolence, #ULFAHistory, #IndiaSecurity, #ConflictResolution, #ULFAFaction, #PeaceInAssam, #NortheastSecurity
Subscribe to our Newsletter
Blog
गंगा जल संधि का खेल: भारत की नई रणनीति
गंगा जल संधि 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई थी, जिसका मकसद गंगा नदी के पानी का न्यायसंगत बंटवारा तय करना था। अब जब यह संधि 2026 में समाप्त होने वाली है,
गंगा जल संधि 2026: बदलते हालात में भारत-बांग्लादेश के रिश्ते
जब भी भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच पानी के बंटवारे की बात आती है, तो मामला सिर्फ नदियों के बहाव या आंकड़ों का नहीं होता। इसमें राजनीति, कूटनीति और दोनों देशों के भविष्य की दिशा भी छिपी होती है। गंगा जल संधि इसी खेल का सबसे बड़ा उदाहरण है, जो अब अपने अंतिम पड़ाव पर है।
गंगा जल संधि: एक नजर इतिहास पर
1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। इस संधि के तहत, फरक्का बैराज से सूखे मौसम (1 जनवरी से 31 मई) के दौरान दोनों देशों को बराबर-बराबर पानी देने की व्यवस्था बनी। साथ ही, बांग्लादेश को हर 10 दिन के क्रिटिकल पीरियड में कम से कम 35,000 क्यूसेक पानी मिलना तय किया गया। यह संधि 30 साल के लिए थी, जो 2026 में खत्म हो रही है।
“भारत ने गंगा जल संधि को लेकर बांग्लादेश पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है, क्योंकि देश को अपनी विकासात्मक जरूरतों के लिए अधिक पानी चाहिए।”
— The New Indian Express, 22 जून 2025
भारत की बदलती रणनीति: क्यों जरूरी है नया समझौता?
पिछले 30 सालों में भारत में जनसंख्या, कृषि और शहरीकरण का दबाव कई गुना बढ़ गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का पैटर्न भी बदल गया है। ऐसे में भारत चाहता है कि नई संधि में रियल टाइम मॉनिटरिंग और फ्लेक्सिबल एलोकेशन जैसी व्यवस्थाएं हों, ताकि पानी का बंटवारा मौजूदा हालात के हिसाब से हो सके, न कि पुराने आंकड़ों के आधार पर।
“भारत अब इंटरेस्ट फर्स्ट डिप्लोमेसी की ओर बढ़ रहा है, जिसमें राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं।”
— Moneycontrol, 27 जून 2025
बांग्लादेश की चिंता: क्यों चाहिए गारंटीड फ्लो?
बांग्लादेश के दक्षिण-पश्चिम इलाके के लिए गंगा का पानी जीवनरेखा है। वहां की सिंचाई, पीने का पानी और समुद्री इलाकों में सेलेनिटी कंट्रोल के लिए गारंटीड पानी जरूरी है। बांग्लादेश चाहता है कि डेटा शेयरिंग पूरी तरह पारदर्शी हो और भारत बिना उसकी सहमति के कोई नया डैम या निर्माण न करे।
“गंगा जल संधि भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए अहम है, क्योंकि यह पानी के बंटवारे की व्यवस्थित प्रक्रिया को सुनिश्चित करती है।”
— Eco-Business, 21 अप्रैल 2025
तीस्ता नदी विवाद और चीन की एंट्री
2011 में तीस्ता नदी के बंटवारे पर भारत और बांग्लादेश के बीच समझौता होना था, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के चलते वह नहीं हो पाया। अब बांग्लादेश तीस्ता प्रोजेक्ट के लिए चीन की ओर झुक रहा है, जिससे भारत की चिंता और बढ़ गई है।
मुख्य मुद्दे: भारत बनाम बांग्लादेश
| मुद्दा | भारत का पक्ष | बांग्लादेश का पक्ष |
|---|---|---|
| पानी की जरूरत | बढ़ती जनसंख्या, कृषि, शहरीकरण | फूड सिक्योरिटी, सिंचाई, नेविगेशन |
| समझौते की अवधि | लचीली, छोटे समय की | लंबी अवधि, स्थायित्व |
| बंटवारे का तरीका | रियल टाइम मॉनिटरिंग, फ्लेक्सिबिलिटी | गारंटीड मिनिमम फ्लो |
| डेटा शेयरिंग | पारदर्शिता, लेकिन नियंत्रण जरूरी | पारदर्शिता, सहमति जरूरी |
| तीस्ता विवाद | पश्चिम बंगाल की चिंता | और पानी की मांग, चीन की ओर झुकाव |
आगे की राह: संतुलन और व्यवहारिक समाधान
अब जब गंगा जल संधि को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत अपने चरम पर है, तो यह साफ है कि एकतरफा मांगें अब नहीं चलेंगी। भारत और बांग्लादेश दोनों को ही अपनी बदलती जरूरतों और प्राथमिकताओं को समझना होगा। तभी कोई दीर्घकालिक और व्यवहारिक समाधान निकल सकता है।
“अब वक्त आ गया है कि भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए नई रणनीति अपनाए।”
— The New Indian Express, 22 जून 2025
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
गंगा जल संधि क्या है?
यह 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुआ जल बंटवारा समझौता है, जो 2026 में समाप्त हो रहा है।
भारत क्यों संधि में बदलाव चाहता है?
भारत की बढ़ती जरूरतें, जलवायु परिवर्तन और पुराने समझौते की सीमाओं के कारण भारत संशोधन चाहता है।
बांग्लादेश की मुख्य चिंता क्या है?
उसे सिंचाई, फूड सिक्योरिटी और सेलेनिटी कंट्रोल के लिए गारंटीड पानी चाहिए।
क्या चीन का प्रभाव इस विवाद में बढ़ रहा है?
हां, तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की भागीदारी से भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ी हैं।
Subscribe to our Newsletter
Blog
सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति का संवैधानिक प्रश्न..
संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या लोकतंत्र के हित में होनी चाहिए, ताकि देश में शासन की स्थिरता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे।
अनुच्छेद 143:राष्ट्रपति की सुप्रीम कोर्ट से राय मांगने का विवाद
परिचय
हाल ही में भारत की राजनीति में एक अहम बदलाव देखने को मिला है, जो न केवल भारत में बल्कि अमेरिका समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है। भारतीय राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय से एक महत्वपूर्ण कानूनी राय मांगी है। इस कदम ने भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका की भूमिका पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह लेख आपको इस विवाद की पूरी जानकारी देगा, साथ ही अनुच्छेद 143 क्या है, सुप्रीम कोर्ट के विकल्प क्या हैं, इस विवाद के राजनीतिक और न्यायिक प्रभाव क्या हो सकते हैं, और भारत व अमेरिका के दर्शकों के लिए इसका महत्व क्या है, यह समझाएगा।
अनुच्छेद 143 क्या है? (What is Article 143?)
भारत के संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को किसी भी संवैधानिक या कानूनी सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने की अनुमति देता है। यह सलाहकार प्रकृति का होता है, यानी सुप्रीम कोर्ट की राय बाध्यकारी नहीं होती, परन्तु इसका प्रभावी महत्व होता है; लेकिन यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट को यह पावर है कि राष्ट्रपति के द्वार मांगे गए सलाह को दे या न दे मतलब सुप्रीम कोर्ट भी इसके लिए बिल्कुल बाध्यकारी नहीं है.
| अनुच्छेद 143 के मुख्य बिंदु | विवरण |
|---|---|
| उद्देश्य | राष्ट्रपति को सलाह देना |
| सवाल किसके द्वारा आते हैं | राष्ट्रपति (संसद या केंद्र सरकार के सुझाव पर) |
| सुप्रीम कोर्ट की भूमिका | सलाहकार राय देना, बाध्यकारी नहीं |
| राय का पालन करना जरूरी नहीं | हाँ |
विवाद की पृष्ठभूमि: तमिलनाडु राज्यपाल बनाम सरकार
तमिलनाडु के राज्यपाल और सरकार के बीच एक संवैधानिक विवाद ने इस मामले को जन्म दिया। राज्यपाल ने विधानसभा से पारित कुछ बिलों पर सहमति देने में विलंब किया, जो राज्य सरकार के लिए परेशानी का कारण बना। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में फैसला देते हुए कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय के लिए निश्चित समयसीमा (राज्यपाल के लिए 3 महीने, राष्ट्रपति के लिए 3 महीने) निर्धारित करनी चाहिए।
इस फैसले को लेकर कई राजनीतिक दल और न्यायिक विशेषज्ञ अलग-अलग राय व्यक्त कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का जवाब और राष्ट्रपति की नई अपील
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले फैसले में राज्यपालों की शक्ति पर नियंत्रण के लिए समयसीमा तय की, राष्ट्रपति महोदया ने अनुच्छेद 143 के तहत 14 सवाल सुप्रीम कोर्ट को भेजे हैं। इनमें प्रमुख सवाल हैं:
- क्या सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक मामलों में बड़ी बेंच (5 या अधिक जज) बनानी चाहिए?
- क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत संविधान के खिलाफ आदेश दे सकता है?
- क्या राज्य और केंद्र के विवाद अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जाने चाहिए?
भारत और अमेरिका में अनुच्छेद 143 जैसे प्रावधान: तुलना
| पहलू | भारत (अनुच्छेद 143) | अमेरिका (Supreme Court Advisory Role) |
|---|---|---|
| सलाहकार भूमिका | राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेना | राष्ट्रपति को कोर्ट से आधिकारिक सलाह नहीं मिलती |
| बाध्यता | सलाह बाध्यकारी नहीं | सलाह बाध्यकारी नहीं |
| कानूनी संदर्भ | संवैधानिक विवादों में उपयोग | न्यायपालिका स्वतंत्र, सलाहकारी भूमिका नहीं |
| राजनीतिक प्रभाव | केंद्र-राज्य विवादों में महत्वपूर्ण | तीन सरकारी शाखाएं स्वतंत्र, राजनीतिक हस्तक्षेप कम |
अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भारत की तरह संविधान के व्याख्याकार की है, लेकिन राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 143 जैसे अधिकार नहीं हैं कि वे कोर्ट से औपचारिक सलाह लें। इसलिए भारत में अनुच्छेद 143 का महत्व और विवाद अलग है।
समाचार से संबंधित लोगों की राय
“सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति की राय लेना न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक सीमा तय करेगा।”
— संदीप मिश्रा, संवैधानिक विशेषज्ञ, दिल्ली विश्वविद्यालय
“अमेरिका में न्यायपालिका पूरी तरह से स्वतंत्र है, लेकिन भारत में अनुच्छेद 143 जैसे प्रावधान न्यायपालिका को कार्यपालिका के करीब लाने का माध्यम हैं।”
— डॉ. जॉन स्मिथ, अमेरिकी राजनीति के प्रोफेसर, हार्वर्ड विश्वविद्यालय
अनुच्छेद 143 के राजनीतिक और न्यायिक प्रभाव
- राज्यपालों की भूमिका पर असर: समय सीमा तय होने से राज्यपालों की सहमति में देरी की संभावना कम होगी, जिससे केंद्र और राज्यों के बीच विवाद घटेगा।
- न्यायपालिका का दायरा बढ़ना: अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट की भूमिका विवादित मुद्दों पर सलाहकार के रूप में बढ़ेगी।
- राजनीतिक तनाव: कुछ राजनीतिक दल इस कदम को न्यायपालिका का कार्यपालिका में हस्तक्षेप मानते हैं।
- अमेरिका के लिए सीख: भारत का यह संवैधानिक विवाद अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि कैसे संवैधानिक व्यवस्थाएं लोकतंत्र में शक्ति संतुलन बनाती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. अनुच्छेद 143 का उद्देश्य क्या है?
राष्ट्रपति को संवैधानिक और कानूनी सवालों पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेना।
2. क्या सुप्रीम कोर्ट की राय बाध्यकारी होती है?
नहीं, यह सलाहकार होती है और बाध्यकारी नहीं होती।
3. इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय के लिए 3-3 महीने की समयसीमा तय करने को कहा गया।
4. अमेरिका में क्या ऐसा कोई प्रावधान है?
नहीं, अमेरिका में राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेने का कोई औपचारिक अधिकार नहीं है।
5. अनुच्छेद 143 से भारतीय राजनीति पर क्या असर होगा?
यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और न्यायपालिका की भूमिका को प्रभावित करेगा।
निष्कर्ष
भारत में अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से राय मांगना एक संवैधानिक और राजनीतिक जटिल मुद्दा है। यह न केवल भारत में बल्कि अमेरिका जैसे लोकतंत्रों के लिए भी एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है कि कैसे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।
इस विवाद से स्पष्ट होता है कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या लोकतंत्र के हित में होनी चाहिए, ताकि देश में शासन की स्थिरता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे।
अगर आप इस विषय पर और जानना चाहते हैं, तो नीचे कमेंट करके बताएं।
स्रोत:
- The Hindu – सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 143
- Indian Express – अनुच्छेद 143 विवाद
- Harvard Political Review – Judiciary in India and US
Subscribe to our Newsletter
Blog
भारत और तालिबान:A new turn in South Asian diplomacy
15 मई 2025 को भारत और तालिबान के बीच पहली बार सीधी बातचीत हुई। जानिए इस कूटनीतिक कदम का क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व, भारत की रणनीति, तालिबान का रुख, और इस घटना का पाकिस्तान समेत अन्य देशों पर प्रभाव।
तालिबान का बदलता रुख: भारत के लिए अवसर?
तालिबान ने भारत को आश्वासन दिया है कि वह किसी भी आतंकी गतिविधि में शामिल नहीं है, और कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला मानता है। यह रुख पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है, जो तालिबान को हमेशा अपनी रणनीतिक गहराई मानता रहा है।
पाकिस्तान को झटका क्यों?
- तालिबान ने भारत के साथ संबंध सुधारने की इच्छा जताई
- ड्रोन हमले के पाकिस्तानी दावे को खारिज किया
- कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के एजेंडे से दूरी
क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ
अन्य प्रमुख देशों का दृष्टिकोण
| देश | स्थिति |
|---|---|
| अमेरिका | अफगानिस्तान से बाहर, लेकिन भारत की सक्रियता पर नज़र |
| चीन | पाकिस्तान के माध्यम से तालिबान से संपर्क |
| रूस | पहले से तालिबान के साथ संवाद में |
| ईरान | अफगान सीमा और शरणार्थियों को लेकर चिंतित |
यह बातचीत भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
- अफगानिस्तान में निवेश की सुरक्षा
भारत ने अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। इन परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए तालिबान से संवाद जरूरी हो गया है। - कूटनीतिक प्रभाव का विस्तार
भारत चाहता है कि अफगानिस्तान में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव सीमित हो। - आंतरिक सुरक्षा
तालिबान से सीधा संपर्क कश्मीर और सीमा क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने में सहायक हो सकता है।
समाचार और प्रमाणिक स्रोत
| समाचार | स्रोत लिंक |
|---|---|
| भारत और तालिबान की बातचीत | MEA India, Al Jazeera, Reuters |
| तालिबान का पाकिस्तान को जवाब | Tolo News, Dawn News (Pakistan), ANI News |
निष्कर्ष
भारत और तालिबान:A new turn in South Asian diplomacy भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल आदर्शवाद के सहारे नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है।
यह वार्ता सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की पूरी रणनीतिक संरचना को प्रभावित कर सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: क्या भारत ने तालिबान को आधिकारिक मान्यता दे दी है?
उत्तर: नहीं। भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन संवाद शुरू कर व्यावहारिक संबंधों की दिशा में कदम बढ़ाया है।
प्रश्न 2: क्या तालिबान भारत के लिए खतरा नहीं है?
उत्तर: तालिबान का वर्तमान रुख भारत के प्रति तटस्थ है। उसने आतंकी हमलों की निंदा की है और पाकिस्तान के एजेंडे से दूरी बनाई है। लेकिन सतर्कता अब भी जरूरी है।
प्रश्न 3: भारत तालिबान से संवाद क्यों कर रहा है?
उत्तर: अफगानिस्तान में निवेश की सुरक्षा, पाकिस्तान और चीन के प्रभाव को संतुलित करना और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना भारत के इस कदम के प्रमुख कारण हैं।
प्रश्न 4: क्या इस बातचीत से कश्मीर को लेकर स्थिति बदल सकती है?
उत्तर: तालिबान द्वारा कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला मानना भारत के लिए एक कूटनीतिक सफलता मानी जा सकती है।
Subscribe to our Newsletter
-
Blog11 months agoUPSC: Civil Services की तैयारी, भारत की सबसे कठिन परीक्षा..
-
Business11 months agoभारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां : भारत के भविष्य की नई उड़ान
-
Blog9 years agoये मुद्रास्फीति या महंगाई क्या होती है,और कैसे कंट्रोल करते हैं..?
-
Blog11 months agoओरण: कांतारा फिल्म के पवित्र वन वास्तव में होते हैं..
-
Blog11 months agoगावों के शहर बनाने का विरोध : बदलते गावों की दास्तान
-
Blog11 months agoग्राम पंचायत: लोकतंत्र की आधारशिला और शहरीकरण का प्रभाव
-
Blog11 months agoगाँवों की स्वतंत्रता पर खतरा: शहरों में बदलते गाँव
-
Art & Culture10 months agoवेम्बूर भेड़ को लेकर तमिलनाडु में बवाल..
